नजरिया
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दिल्ली में केजरीवाल इसलिए जीते क्योंकि उन्होंने वक्त रहते अपनी ज़बान पर काबू पा लिया : नीरज बधवार
कपिल मिश्रा की हार बताती है कि इस देश की जनता ने नफरत की राजनीति को हरा दिया। अच्छा जी,…
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दिल्ली में #यूरोपियन देशों के #मॉडल को लागू करने से पहले क्या बाकी की बातों और #पॉलिसी को लागू करना जरूरी नहीं है -श्वेता रश्मि
#यूरोपियन देशों के #मॉडल को लागू करने से पहले क्या बाकी की बातों और #पॉलिसी को लागू करना जरूरी नहीं है, उन देशों में #जुडिशरी में महिलाओं…
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सिर्फ ईवीएम को दोष देकर अपनी कमजोरी एवं गलतियों पर पर्दा नहीं डाल सकते हैं-शैलेंद्र वर्णवाल
सिर्फ ईवीएम को दोष देकर अपनी कमजोरी एवं गलतियों पर पर्दा नहीं डाल सकते हैं। सर्वप्रथम हम ईवीएम को क्लीन…
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अलविदा महामानव वो आप ही हो जो हमारे अंदर कविता बन कर हमेशा जियोगे।आप अमर हैं नीरज जी अंतर बस इतना है पहले आप शरीर थे अब शब्द हो गए हैं- राजेश कुमार
मेरी और नीरज जी की पहली मुलाकात इलाहाबाद अल्लाहपुर रामलीला मैदान के कवि सम्मेलन में हुई थी, यह मेरे कविता…
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अब तीन टुकडें होगा पाकिस्तान- हाथ से निकलता सिंध-बलूचिस्तान
आर.के.सिन्हा I कहते हैं कि जो लोग शीशे के घरों में रहते हैं, वे दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। कुछ दिन…
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इस्लामिक आतंकवाद से लड़ाई कई मोर्चो पर लड़ी जानी है, क्या विश्वभर के मुसलमान खासतौर पर इस जंग को जीतने के लिए तैयार है ? आर के सिन्हा
आर.के.सिन्हा I फ्रांस आतंकी हमले में फिर से लहुलुहान है। फ्रांस के नीस में आतंकवादियों ने ट्रक से भीड़ पर हमला किया। इसमें कम से कम 84 लोगों की मौत हो गई है। इससे कुछ समय पहले ही रमजान के दौरान तुर्की की राजधानी इस्तांबुल एयरपोर्ट पर हुए तीन सुसाइड बम ब्लास्ट में दर्जनों मासूम मारे गए। इसी तरह से इराक में आतंकी हमले में सैकड़ों मासूम जान गंवा बैठे। पड़ोसी मुल्क ढाका में जो कुछ उसे सारा संसार जानता है। कुरआन की आयतें न सुनाने पर कई लोगों की ढ़ाका में गर्दनों को रेत कर हलाल किया गया। और अपने देश में भी रमजान के दौरान कश्मीर के पंपोर में लश्कर-ए-तैयबा के दो आत्मघाती आतंकियों ने हमले को अंजाम दिया। हमले में 9 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए थे। यानी फ्रांस से लेकर इस्तांबुल और इराक से लेकर हमारे अपने यहां इस्लामिक आतंकवादी मासूमों का खून बहाने से बाज नहीं आ रहे हैं। फ्रांस के शहर नीस में जहां हमला हुआ है, वहां लोग नेशनल डे के मौके पर आतिशबाजी देखने के लिए जुटे थे। माना जा रहा है कि खौफनाक आईएसआईएस ने किया नीस में हमला। इंस्ताबुल, कश्मीर, पेरिस, ढाका, नेरौबी, पेशावर वगैरह में आतंकी हमलों के बाद एक बार फिर से ये सवाल खड़ा होता नजर आ रहा है- दुनियाभर के मुसलमानों इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों से लड़ने के लिए कितने तैयार हैं? कायदे से मुसलमानों को आईएसआई,अल-कायदा, लश्करे-तैयबा सरीखे संगठनों से लड़ना होगा। पेरिस से लेकर ढ़ाका में हुईं घटनाओं से भारत अपने को जोड़कर देखता है।इन हमलों के कारण खून से सनी लाशों और सिसकियों से सहमी जगहों से भारत का करीबी भावनात्मक संबंध है। इस रोशनी में भारत का इन घटनाओं से कहीं न कहीं जुड़ना लाजिमी है। भारत भी बीते दशकों से इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में रहा है। लें लोहा आतंकियों से अब वक्त का तकाजा है कि अमन का संदेश देने वाले इस्लामिक संगठन पेरिस से पेशावर और कश्मीर से नेरौबी के हमलावरों से लोहा लें। बेशक,पूरी दुनिया में आतंकवाद नामक संक्रामक बीमारी के प्रसार के बाद से ही बार-बार आंतकवाद को इस्लाम से जोड़ा जाता रहा है। लेकिन हमेशा से इस राय की तीखी आलोचना होती रही है। इस बात पर लंबे समय से बहस जारी रही है कि क्या आतंकवाद को किसी धर्म विशेष के साथ जोड़ना जायज है? इसके जवाब में कुछ विद्वानों का मानना रहा है कि ऐसा करना गलत है और महज मुट्ठी भर राह से भटके लोगों की वजह से पूरे इस्लाम धर्म को दोषी ठहराना इस धर्म को कमतर करने की कोशिश है। पर अब चर्चित मुस्लिम साहित्यकार सलमान रश्दी ने कहा है कि इस्लामी आतंकवाद भी इस्लाम का ही एक रूप है और इसके खात्मे के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना जरूरी है। सलमान रुश्दी कहते है कि इस्लाम का हिंसक रूप भी इस्लाम है जो पिछले 15-20 वर्षों के दौरान बहुत ही ताकतवर बनकर उभरा है।रुश्दी अपनी विचारधारा के लिए हमेशा से ही कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं और उनके उपन्यास “सैटनिक वर्सेज” के लिए उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया था। ईरान के शासक अयातुल्ला खोमैनी ने रुश्दी का सिर काटकर लाने वालों को इनाम देने तक का ऐलान कर दिया था। अगर रश्दी की राय से इतर बात हो तो यह भी माना जा सकता है कि आतंकवाद और इस्लाम का कोई संबंध हो ही नहीं सकता। जो मुसलमान इस्लाम का नाम लेकर कभी और कहीं आतंकवादी घटना में लिप्त होते हैं,दरअसल वे मुसलमान हैं ही नहीं। उनका इस्लाम से हरगिज कोई संबंध नहीं हो सकता। पर ये भी सच है कि पेशावर में बड़ी संख्या में स्कूली बच्चों का कत्लेआम करने वाले अपने को सच्चा मुसलमान ही बता रहे थे। मुंबई में साल 2008 में पाकिस्तान से आए आतंकियों की गोलियों से देश दहल गया था। सैकड़ों लोग मारे गए या घायल हुएI उस कत्लेआम को अंजाम भी मुसलमानों ने ही दिया था। हालांकि, ये सब किस मुंह से अपने को मुसलमान होने का दावा कर सकते है। नेरौबी के वेस्टगेट मॉल में साल 2014 में मॉल में बीसियों लोगों को मारने वाले अल-शबाब के आतंकवादी मुसलमान ही थे। हालांकि, ये सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि किसी भी आतंकी वारदात में शामिल होने वाला शख्स सिर्फ इन्सानियत के दुश्मन हैंIउनका किसी मजहब से कोई लेना-देना नहीं हो सकता। बेशक, अपने को इस्लामिक संगठन कहने वाले अल कायदा, अल शबाब, आईएसआईएस, जमाते-उल-दावा वगैरह कतई इस्लामिक नहीं माने जा सकते। इस्लाम किसी को पीड़ा देने या यातनाएं देने की अनुमति नहीं देता। इस्लाम की कई आयतें हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ है। जो इसकी शिक्षाओं से वाकिफ नहीं हैं, वे ही इसे हिंसक धर्म के तौर पर पेश करते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि न्यूयार्क से लेकर नेरौबी तक होने वाली किसी भी आतंकी वारदात के बाद मुसलमान सहम से जाते हैं। उन्हें लगता है कि मानो वे गुनहगार हों। वे अपराधबोध से ग्रस्त होने लगते हैं। यह स्वाभाविक भी है I लेकिन, सिर्फ इस्लामिक नाम होने से कोई मुसलमान नहीं हो सकता। मुसलमान तो वही है,जो शरीयत, हदीस और कुरआन की शिक्षाओं के अनुसार जीवनयापन करे। बगल में इस्लामिक आतंकवाद की प्रयोगशाला उधर, पड़ोसी पाकिस्तान में इस्लामिक चरमपंथी कत्लेआम करते वक्त कुछ देख ही नहीं रहे। ये शिया, अहमदिया, ईसाइयों,हिन्दुओं सबको ही तो मार रहे हैं। पर अफसोस कि पाकिस्तानी सरकार इन पर लगाम नहीं लगा सकी। शायद उसकी नीयत में ही खोट हैI पाकिस्तान इस्लामिक आतंकवाद की प्रयोगशाला बन गया। ये अब पूरी दुनिया में जहर की तरह से फैल चुका है। इस रोग का कारगर इलाज तो को करना ही होगा। और इस लिहाज से पहल मुसलमानों और, इस्लामिक देशों को ही करनी होगी। लेकिन, यह भी सच है कि हमारे अपने देश में कुछ आतंकियों के जनाजों में अनेकों गुमराह मुसलमान बढ़-चढ़कर शामिल होते रहे है। भारतीय सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में बुरहान मुजफ्फर वानी की मौत के बाद निकले जनाजे में हजारों लोग उमड़े। शवयात्रा के समय जमकर उत्पात भी हुआ। इसी तरह से मुंबई धमाकों के गुनहगार याकूब मेमन की मुंबई में निकली शव यात्रा को भी जरा याद कर लीजिए। मुंबई में वर्ष 1993 में हुए सीरियल बम विस्फोट के मामले में दोषी याकूब मेमन को नागपुर केंद्रीय कारागार में फांसी दी गयी। इसके बाद उसकी मुंबई में शव यात्री निकली। उसमें भी हजारों लोग शामिल हुए। सवाल यह है कि क्या कानून की नजरों में गुनहगार साबित हो चुके मेमन और बुरहान को लेकर मुसलमानों को सम्मान और प्रेम का भाव दिखाना जायज है ? बुरहान हिज्बल मुजाहिदीन के कमांडर के तौर पर काम कर रहा था। आतंकवादियों की लगातार भर्ती कर रहा था। और मेमन ने मुंबई धमाकों की रणनीति बनाने में खास भूमिका अदा की थी। इस पृष्ठभूमि में अगर अगर कोई इस्लाम और आतंकवाद को एकसाथ जोड़कर देखे तो इसमें गलत क्या है ? बोलती बंद हो नाईक की अब दुनिया में अपने को इस्लाम का सबसे खासमखास प्रवक्ता बताने वाला डा. जाकिर नाईक जैसे तत्वों से भी लोहा लेना होगा। डा. जाकिर नाईक संदेहों और सवालों के घेरे में हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि ढाका में आतंकी हमले में शामिल दो युवक नाईक के विचारों और भाषणों से प्रभावित थे। एक आतंकी ने सोशल साइट्स पर जाकिर नाईक का वो बयान शेयर किया था. जिसमें कहा गया था कि “सभी मुसलमान को आतंकी बनना चाहिए।” वो लगातार इस्लाम के नाम पर जहर घोलता रहा। उसे रोज दुबई से रिले होने वाले पीस टीवी पर सुना जा सकता है। एक रट्टू तोता की तरह नाईक कुरआन, बाइबल और कुछ हिन्दू ग्रन्थों के पाठ सुनने वालों को अपने इस्लाम के ज्ञान के पाठ पिला रहा होता है। उसके जहरीले भाषणों के चलते उस पर कनाडा, ब्रिटेन और मलेशिया समेत पांच देशों में नाईक बैन हैं। यानी इस्लामिक आतंकवाद से लड़ाई कई मोर्चो पर लड़ी जानी है। लड़ाई लंबी हो सकती है। क्या सारी दुनिया आमतौर पर विश्वभर के मुसलमान खासतौर पर इस जंग को जीतने के लिए तैयार है ? (लेखक राज्यसभा सांसद हैं)
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कश्मीर में जनाजो की राजनीती – जो अब तक हुआ, उसे सही करने का नरेन्द्र मोदी जी के सामने एक मौका भी है और एक चुनौती भी : आर के सिन्हा
आर. के. सिन्हा I दो आतंकियों के जनाजों में उमड़ी भीड़ के चलते सरकार के कर्णधारों से लेकर देश के हरेक…
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सवालों के घेरे में जाकिर नाईक,कट्टरपंथी इस्लाम के आत्म मुग्ध रट्टू तोते का खेल खत्म !!! आर के सिन्हा
आर.के.सिन्हा I अब अपने को इस्लाम का सबसे खासमखास प्रवक्ता बताने वाला डा. जाकिर नाईक का खेल खत्म होता नजर आ रहा है। डा. जाकिर नाईक सवालों के घेरे में हैं। कहने वाले कह रहे हैं कि ढाका में आतंकी हमले में शामिल दो युवक नाईक के विचारों और भाषणों से प्रभावित थे। एक आतंकी ने सोशल साइट्स पर जाकिर नाईक का वो बयान शेयर किया था. जिसमें कहा गया था कि ‘’सभी मुसलमानों को आतंकी बनना चाहिए।‘’ बेशक, उसकी गतिविधियां तो शुरू से ही संदिग्ध थी, पर उसका दिग्विजय सिंह जैसे रहनुमाओं के चलते कभी बाल भी बांका नहीं हो सका। वो लगातार इस्लाम के नाम पर जहर उगलता रहा और मुस्लिम नवयुवकों में घोलता रहा। उसे रोज दुबई से रिले होने वाले पीस टीवी पर सुना जा सकता है। एक रट्टू तोता की तरह नाईक कुरआन, बाइबल और कुछ हिन्दू ग्रन्थों के पाठ सुनने वालों को अपने इस्लाम के ज्ञान के पाठ पिला रहा होता है। अब बड़ा सवाल ये है कि जब भारत में पीस टीवी के प्रसारण पर रोक है तो उसे कुछ केबल ऑपरेटर प्रसारित कैसे कर देते हैं? उन्हें इस कम के लिए धन कौन दे रहा है? यानी साफ है कि कमजोर कानून के चलते ही वो अपना धंधा चला रहा है। हमारे इधर अफसोस कि जब हालात बेहद संगीन हो जाते हैं तो सुरक्षा बलों की नींद खुलने लगती है। नाईक दावा करता है कि पीस टीवी के जरिये दुनिया भर में उसके 20 करोड़ दर्शक हैं। उसके जहरीले भाषणों के चलते उस पर कनाडा, ब्रिटेन और मलेशिया समेत पांच देशों में नाईक प्रतिबंधित हैं। कुल मिलाकर नाईक के भाषणों का निचोड़ यह होता है कि इस्लाम ईश्वर का अंतिम धर्म और कुरआन उसका अंतिम ग्रन्थ है। यहां तक तो ठीक है। उसका दावा, उसे मुबारक। यह अच्छी बात है कि अब कोई नया धर्म और कोई नई आसमानी किताब जमीन पर नहीं आएगी। वो कुरआन को बाइबल और हिन्दू ग्रंथों से बेहतर साबित करने की फिराक में लगा रहता है। उसके कार्यक्रमों में कुछ हिन्दू भी आते हैं और कुछ हिन्दू नौजवान उसकी कार्यक्रमों में उससे प्रभावित होकर वहां पर इस्लाम कबूल करने की घोषणा भी करते हैं। हालांकि, कुछ जानकार कहते हैं कि उसके कार्यक्रमों में हिन्दुओं का मुसलमान बनने की बातें नाटक ही होती हैं। उसमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं होती। मुझे याद है कि एक दिन एक चीनी लड़की ने डा. ज़ाकिर नाइक को उसके पीस टीवी पर आने वाले शो में धो कर रख दिया था अपने अकाट्य तर्कों से। नाईक सिर्फ अपनी भीङ में बोल सकता है? यानी जहाँ पूछने वाले को उत्तर पर बहस की इजाजत नहीं होती है।नाईक किसी बङी यूनिवर्सिटी में बहस के लिये नहीं गया।किसी विज्ञान के प्रोफेसर से सीधे डिबेट नहीं करता है। आपको उससे बड़ा तोता आज की तारीख में ढूंढने से नहीं मिलेगा।बस सारी बात और सारा ज्ञान कुरान पर आकर ख़त्म हो जाता है उसका। ये आत्म मुग्ध विद्वान मुस्लिम समाज के अहंकार को येन केन प्रकारेण प्रतिस्थापित करने में लगा रहता हैं।कभी ये इतना साहस नहीं दिखा पाएगा कहने का कि ये बात कुरान में गलत है या मुहम्मद की ये बात गलत है। इसकी मुस्लिम समाज में वृहतर लोकप्रियता वैचारिक गुलामी का सूचक है। सच्चाई ये है कि मेडिकल क्षेत्र का ये जहरीले भाषण देने वाला डाक्टर मुसलमानों…
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ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट विवाद : चोरी और सीनाजोरी – योगेन्द्र यादव
योगेन्द्र यादव I ये ऑफिस ऑफ़ प्रॉफिट वाला विवाद एक बार फिर साबित करता है कि भ्रष्टाचार का खात्मा करने आई…
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नए परिध्र्श्य में अखलाक की मौत पर उठते नए सवाल : कैसा चरित्र है हमारे महान धर्मनिरपेक्ष नेताओं का? आर के सिन्हा
आर.के.सिन्हा I पिछले साल 30 सितंबर को राजधानी से सटे नोएडा के बिसहाड़ा गांव में एक शख्स को अपने घर में गौं-मांस रखने के आरोप में उग्र भीड़ ने मार डाला था। ज़ाहिर है घर के फ्रिज में गौ मांस उसने पूजा करने के लिए तो रखा नहीं होगा, खाने के लिए ही रखा होगाI घटना के बाद तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्ष नेता मृतक मोहम्मद अखलाक के घर पहुंचने लगे,ठीक उसी तरह जैसे बीच जंगल में मधुमकखी का बड़ा छत्ता तूफ़ान में गिर जाये तो भालू-बन्दर उस पर टूट पड़ते हैं, वे उसके घर में जाकर संवेदना कम और सियासत ज्यादा करते नजर आ रहे थेI अब उत्तरप्रदेश सरकार के मथुरा स्थित लैब के फोंरसिक रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि भीड़ के शिकार हुए मोहम्मद अखलाक के घर से मिला मांस “गोमांस” ही था।फोरेंसिक रिपोर्ट के नतीजे आने के बाद अब उन सियासी रहनुमाओं से दो सवाल पूछने करने का मन कर रहा है, पहला क्या वह अखलाक की हत्या के बाद उसके घरवालों से संवेदना जाहिर करने के लिए बिसहाड़ा गांव पहुंचे थे। पहला, क्या वे अखलाक की मौत पर अफसोस जता रहे थे? अगर वे अफसोस जता रहे थे तो ठीक है। पर क्या वे इस क्रम में अखलाक के घर में रखे हुए गौमांस को सही ठहरा रहे थे? उत्तर प्रदेश में गौ-मांस की बिक्री से लेकर इसके सेवन पर कानूनी रोक है। इसलिए ये सवाल पूछा जा रहा है कि क्या अखलाक को अपने घर में गौं-मांस रखना चाहिए था या उसका सेवन करना चाहिए था ? संवेदनाओं का सच अखलाक के घर कांग्रेस के वाइस प्रेसिडेंट राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और असदद्दीन ओवैसी से लेकर माकपा की वृंदा करात तक ने बाकी तमाम दलों के नेताओं ने हाजिरी दी। यानी अखलाक की जघन्य हत्या के बाद उसके घर नेताओं का तांता लगा ही रहा। केन्द्रीय पर्यटन और संस्कृति राज्यमंत्री महेश शर्मा ने खुद अखलाक के घर जाकर कहा, “यह हमारी संस्कृति पर धब्बा है और सभ्य समाज में इस तरह की घटनाओं का कोई स्थान नहीं है। अगर कोई कहता है कि यह पूर्व नियोजित था तो मैं इससे सहमत नहीं हूं।” इसके बावजूद विपक्ष के नेताओं को तो मानो सरकार को घेरने का मौका मिल गया हो। कानून-व्यवस्था राज्य का दायित्व है। अख़लाक़ के हिन्दू मित्र ने जब पुलिस को फ़ोन कियातब पुलिस तो आई नहीं जब उसकी मौत की सूचना दी गई तो तब पुलिस आईI यानी उस घटना को रोक पाने में उत्तर प्रदेश का पुलिस महकमा पूरी तरह फेल हुआ। लेकिन,धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने सारा दोष केन्द्र सरकार पर डाल दिया और पूरे देश में असहिशुनाता का माहौल है इसका नारा बुलंद कर दिया, जिसे वामपंथी मीडिया ने पुरजोर हवा देकर देश भर में फ़ैलाने का काम कर दिया। अपने जहरीले बयानों के लिए बदनाम हो चुके ओवैसी ने अखलाक के कत्ल को ‘पूर्व नियोजित हत्या’ बताया। ओवैसी ने तो यहां तक कहा, “प्रधानमंत्री मोदी ने गायिका आशा भोंसले के बेटे की मौत पर शोक जताया पर उन्हें अखलाक की मौत पर संवेदना व्यक्त करना सही नहीं लगा।“ अब जरा देख लीजिए की ओवैसी किस तरह से लाशों पर सियासत करते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी पीछे रहने वाले नहीं थे। उन्होंने गोवध और…
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