एन सी आर खबर ब्यूरो
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कश्मीर बदल रहा है : महसूस किया आपने ? अवनीश पी एन शर्मा
“कश्मीर हमारा अटूट-अभिन्न अंग है”। कानों में उतरता यह नारा आज़ादी के बाद पैदा हुए हर हिंदुस्तानी ने राजनीतिक लोरी…
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देखिये आपका कट्टर नजरिया अब हल्का होने लगा है . यही मुक्ति है – मंजुला सक्सेना
आप का जनम हिंदू घर में हुआ तो आप हिंदू हित की बात करेंगे आपका जनम मुस्लिम घर में हो…
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पत्रकारिता के गुरु स्वर्गीय बालेश्वर अग्रवाल की ९६वीं जयन्ती पर हिन्दुस्थान समाचार कार्यालय में श्रधांजली दी
एन सी खबर ब्यूरो I नॉएडा स्थित हिन्दुस्थान समाचार कार्यालय पत्रकारिता के गुरु स्वर्गीय बालेश्वर अग्रवाल की ९६वीं जयन्ती मनाई…
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अब ना तो लोहिया प्रासंगिक हैं न नेहरू – राजेश श्रीवास्तव
ये अमरीका का कदम चूमने का सिलसिला नरसिम्हा राव के ज़माने से शुरू हुआ जो अब तक जारी है।सच पूछा…
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एलजी के आंदोलनरत कर्मचारियों के समर्थन में किसान कामगार मोर्चा ने सौंपा ज्ञापन
ग्रेटर नोएडा :देश की जानी.मानी इलैक्ट्रोनिक्स कंपनी एलजी के कर्मचारी भरी बरसात में अपनी मांगों को लेकर कंपनी के अंदर…
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इस्लामिक आतंकवाद से लड़ाई कई मोर्चो पर लड़ी जानी है, क्या विश्वभर के मुसलमान खासतौर पर इस जंग को जीतने के लिए तैयार है ? आर के सिन्हा
आर.के.सिन्हा I फ्रांस आतंकी हमले में फिर से लहुलुहान है। फ्रांस के नीस में आतंकवादियों ने ट्रक से भीड़ पर हमला किया। इसमें कम से कम 84 लोगों की मौत हो गई है। इससे कुछ समय पहले ही रमजान के दौरान तुर्की की राजधानी इस्तांबुल एयरपोर्ट पर हुए तीन सुसाइड बम ब्लास्ट में दर्जनों मासूम मारे गए। इसी तरह से इराक में आतंकी हमले में सैकड़ों मासूम जान गंवा बैठे। पड़ोसी मुल्क ढाका में जो कुछ उसे सारा संसार जानता है। कुरआन की आयतें न सुनाने पर कई लोगों की ढ़ाका में गर्दनों को रेत कर हलाल किया गया। और अपने देश में भी रमजान के दौरान कश्मीर के पंपोर में लश्कर-ए-तैयबा के दो आत्मघाती आतंकियों ने हमले को अंजाम दिया। हमले में 9 सीआरपीएफ के जवान शहीद हो गए थे। यानी फ्रांस से लेकर इस्तांबुल और इराक से लेकर हमारे अपने यहां इस्लामिक आतंकवादी मासूमों का खून बहाने से बाज नहीं आ रहे हैं। फ्रांस के शहर नीस में जहां हमला हुआ है, वहां लोग नेशनल डे के मौके पर आतिशबाजी देखने के लिए जुटे थे। माना जा रहा है कि खौफनाक आईएसआईएस ने किया नीस में हमला। इंस्ताबुल, कश्मीर, पेरिस, ढाका, नेरौबी, पेशावर वगैरह में आतंकी हमलों के बाद एक बार फिर से ये सवाल खड़ा होता नजर आ रहा है- दुनियाभर के मुसलमानों इस्लाम के नाम पर आतंकवाद फैलाने वाले संगठनों से लड़ने के लिए कितने तैयार हैं? कायदे से मुसलमानों को आईएसआई,अल-कायदा, लश्करे-तैयबा सरीखे संगठनों से लड़ना होगा। पेरिस से लेकर ढ़ाका में हुईं घटनाओं से भारत अपने को जोड़कर देखता है।इन हमलों के कारण खून से सनी लाशों और सिसकियों से सहमी जगहों से भारत का करीबी भावनात्मक संबंध है। इस रोशनी में भारत का इन घटनाओं से कहीं न कहीं जुड़ना लाजिमी है। भारत भी बीते दशकों से इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में रहा है। लें लोहा आतंकियों से अब वक्त का तकाजा है कि अमन का संदेश देने वाले इस्लामिक संगठन पेरिस से पेशावर और कश्मीर से नेरौबी के हमलावरों से लोहा लें। बेशक,पूरी दुनिया में आतंकवाद नामक संक्रामक बीमारी के प्रसार के बाद से ही बार-बार आंतकवाद को इस्लाम से जोड़ा जाता रहा है। लेकिन हमेशा से इस राय की तीखी आलोचना होती रही है। इस बात पर लंबे समय से बहस जारी रही है कि क्या आतंकवाद को किसी धर्म विशेष के साथ जोड़ना जायज है? इसके जवाब में कुछ विद्वानों का मानना रहा है कि ऐसा करना गलत है और महज मुट्ठी भर राह से भटके लोगों की वजह से पूरे इस्लाम धर्म को दोषी ठहराना इस धर्म को कमतर करने की कोशिश है। पर अब चर्चित मुस्लिम साहित्यकार सलमान रश्दी ने कहा है कि इस्लामी आतंकवाद भी इस्लाम का ही एक रूप है और इसके खात्मे के लिए इस सच्चाई को स्वीकार करना जरूरी है। सलमान रुश्दी कहते है कि इस्लाम का हिंसक रूप भी इस्लाम है जो पिछले 15-20 वर्षों के दौरान बहुत ही ताकतवर बनकर उभरा है।रुश्दी अपनी विचारधारा के लिए हमेशा से ही कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे हैं और उनके उपन्यास “सैटनिक वर्सेज” के लिए उनके खिलाफ फतवा जारी कर दिया गया था। ईरान के शासक अयातुल्ला खोमैनी ने रुश्दी का सिर काटकर लाने वालों को इनाम देने तक का ऐलान कर दिया था। अगर रश्दी की राय से इतर बात हो तो यह भी माना जा सकता है कि आतंकवाद और इस्लाम का कोई संबंध हो ही नहीं सकता। जो मुसलमान इस्लाम का नाम लेकर कभी और कहीं आतंकवादी घटना में लिप्त होते हैं,दरअसल वे मुसलमान हैं ही नहीं। उनका इस्लाम से हरगिज कोई संबंध नहीं हो सकता। पर ये भी सच है कि पेशावर में बड़ी संख्या में स्कूली बच्चों का कत्लेआम करने वाले अपने को सच्चा मुसलमान ही बता रहे थे। मुंबई में साल 2008 में पाकिस्तान से आए आतंकियों की गोलियों से देश दहल गया था। सैकड़ों लोग मारे गए या घायल हुएI उस कत्लेआम को अंजाम भी मुसलमानों ने ही दिया था। हालांकि, ये सब किस मुंह से अपने को मुसलमान होने का दावा कर सकते है। नेरौबी के वेस्टगेट मॉल में साल 2014 में मॉल में बीसियों लोगों को मारने वाले अल-शबाब के आतंकवादी मुसलमान ही थे। हालांकि, ये सुनने में बहुत अच्छा लगता है कि किसी भी आतंकी वारदात में शामिल होने वाला शख्स सिर्फ इन्सानियत के दुश्मन हैंIउनका किसी मजहब से कोई लेना-देना नहीं हो सकता। बेशक, अपने को इस्लामिक संगठन कहने वाले अल कायदा, अल शबाब, आईएसआईएस, जमाते-उल-दावा वगैरह कतई इस्लामिक नहीं माने जा सकते। इस्लाम किसी को पीड़ा देने या यातनाएं देने की अनुमति नहीं देता। इस्लाम की कई आयतें हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ है। जो इसकी शिक्षाओं से वाकिफ नहीं हैं, वे ही इसे हिंसक धर्म के तौर पर पेश करते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि न्यूयार्क से लेकर नेरौबी तक होने वाली किसी भी आतंकी वारदात के बाद मुसलमान सहम से जाते हैं। उन्हें लगता है कि मानो वे गुनहगार हों। वे अपराधबोध से ग्रस्त होने लगते हैं। यह स्वाभाविक भी है I लेकिन, सिर्फ इस्लामिक नाम होने से कोई मुसलमान नहीं हो सकता। मुसलमान तो वही है,जो शरीयत, हदीस और कुरआन की शिक्षाओं के अनुसार जीवनयापन करे। बगल में इस्लामिक आतंकवाद की प्रयोगशाला उधर, पड़ोसी पाकिस्तान में इस्लामिक चरमपंथी कत्लेआम करते वक्त कुछ देख ही नहीं रहे। ये शिया, अहमदिया, ईसाइयों,हिन्दुओं सबको ही तो मार रहे हैं। पर अफसोस कि पाकिस्तानी सरकार इन पर लगाम नहीं लगा सकी। शायद उसकी नीयत में ही खोट हैI पाकिस्तान इस्लामिक आतंकवाद की प्रयोगशाला बन गया। ये अब पूरी दुनिया में जहर की तरह से फैल चुका है। इस रोग का कारगर इलाज तो को करना ही होगा। और इस लिहाज से पहल मुसलमानों और, इस्लामिक देशों को ही करनी होगी। लेकिन, यह भी सच है कि हमारे अपने देश में कुछ आतंकियों के जनाजों में अनेकों गुमराह मुसलमान बढ़-चढ़कर शामिल होते रहे है। भारतीय सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में बुरहान मुजफ्फर वानी की मौत के बाद निकले जनाजे में हजारों लोग उमड़े। शवयात्रा के समय जमकर उत्पात भी हुआ। इसी तरह से मुंबई धमाकों के गुनहगार याकूब मेमन की मुंबई में निकली शव यात्रा को भी जरा याद कर लीजिए। मुंबई में वर्ष 1993 में हुए सीरियल बम विस्फोट के मामले में दोषी याकूब मेमन को नागपुर केंद्रीय कारागार में फांसी दी गयी। इसके बाद उसकी मुंबई में शव यात्री निकली। उसमें भी हजारों लोग शामिल हुए। सवाल यह है कि क्या कानून की नजरों में गुनहगार साबित हो चुके मेमन और बुरहान को लेकर मुसलमानों को सम्मान और प्रेम का भाव दिखाना जायज है ? बुरहान हिज्बल मुजाहिदीन के कमांडर के तौर पर काम कर रहा था। आतंकवादियों की लगातार भर्ती कर रहा था। और मेमन ने मुंबई धमाकों की रणनीति बनाने में खास भूमिका अदा की थी। इस पृष्ठभूमि में अगर अगर कोई इस्लाम और आतंकवाद को एकसाथ जोड़कर देखे तो इसमें गलत क्या है ? बोलती बंद हो नाईक की अब दुनिया में अपने को इस्लाम का सबसे खासमखास प्रवक्ता बताने वाला डा. जाकिर नाईक जैसे तत्वों से भी लोहा लेना होगा। डा. जाकिर नाईक संदेहों और सवालों के घेरे में हैं। यह प्रमाणित हो चुका है कि ढाका में आतंकी हमले में शामिल दो युवक नाईक के विचारों और भाषणों से प्रभावित थे। एक आतंकी ने सोशल साइट्स पर जाकिर नाईक का वो बयान शेयर किया था. जिसमें कहा गया था कि “सभी मुसलमान को आतंकी बनना चाहिए।” वो लगातार इस्लाम के नाम पर जहर घोलता रहा। उसे रोज दुबई से रिले होने वाले पीस टीवी पर सुना जा सकता है। एक रट्टू तोता की तरह नाईक कुरआन, बाइबल और कुछ हिन्दू ग्रन्थों के पाठ सुनने वालों को अपने इस्लाम के ज्ञान के पाठ पिला रहा होता है। उसके जहरीले भाषणों के चलते उस पर कनाडा, ब्रिटेन और मलेशिया समेत पांच देशों में नाईक बैन हैं। यानी इस्लामिक आतंकवाद से लड़ाई कई मोर्चो पर लड़ी जानी है। लड़ाई लंबी हो सकती है। क्या सारी दुनिया आमतौर पर विश्वभर के मुसलमान खासतौर पर इस जंग को जीतने के लिए तैयार है ? (लेखक राज्यसभा सांसद हैं)
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