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संस्कारित शान्ति

दिलचस्प ढंग से जिंदगी जीना भी एक कला है, कुछ लोग दिलचस्प जीवन जीने का दंभ तो भरते है लेकिन वास्तव मे होता वो नकारत्मक जीवन जी रहे होते है जो उन्हें भी नहीं पता होता, ठीक वैसे ही जैसे इस्लाम का अंधा सिर्फ एक  हरे रंग को ही सतरंगा मानता है या यों कहले की मुसलमान भाईचारे का दंभ भरते हैं.

 

दिलचस्प जीवन जीने के लिए ये आवश्यक है की  जिंदगी मे कुछ नया होता रहे, सीधा सादा जीवन नीरस होता है उबाऊ होता है इसके लिए कुछ होना जरुरी है, जैसे एक कवि किसी “रचना” के लिए रचना रच के प्रसन्न हो सकता है, चित्रकार किसी “चित्रलेखा” का चित्र बना खुश हो लेता है,अपने जीवन को दिलचस्प बनाता है, ये तरीके सकारात्मक कहलाते है, जो औरो को यदि सुख न दे तो कम से कम तकलीफ नहीं देते, लेकिन कुछ लोग दिलचस्प बनाने के लिए कई प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रम करते हैं, जो उनके हिसाब से  निश्चय सांस्कृतिक है, जो वास्तव मे संस्कारित होते हैं.

 

धीरे धीरे अब  मुझे समझ आने लगा है की इस्लामी शांति क्या है ?? इस्लामी शांति वो है, जो शांति पूर्वक गैर मुसलमानों की शांति भंग करने से मिलती है, और इस प्रकार के जीवन से मुसलमानों को काफी सुकून भी मिलता है, और इस प्रकार के शान्ति को प्राप्त करने के लिए किये गए संस्कारित सांस्कृतिक कार्यक्रममो से मुसलमानों  का जीवन भी दिलचस्प बना रहता है.

 

सन ८९-९० के दौरान जब कश्मीर जैसा दिलचस्प जगह के बाहुल्य लोगो के जीवन मे नीरसता आई तो उन्होंने भी एक सांस्कृतिक कार्यक्रम रखा, “हिंदू भगाओ कार्यक्रम”, कारण था हिन्दुवो का शांत स्वभाव होना, हिंदुओं के इस शांत स्वभाव ने मुसलमानों की संस्कारित शांत स्वभाव मे खलल डाला था अतः  हिन्दुओ के शांत  स्वभाव से आतंकित मुसलमानो ने एक फैसला किया, जब तक ये हिंदू कश्मीर छोड़ नहीं जाते तब तक हम शांति पूर्वक इनका क़त्ल करते रहेंगे, आदरपूर्वक इनकी महिलाओ का बाल्त्कार करते रहेंगे. किया भी यही, उस समय की पूरी बात समझने के लिए कृपया दिया हुआ  विडियो लिंक जरुर देखे :-  इस्लामी शान्ति 

 

इस तरह से एक पंथ और दो काज हो जाते हैं, एक जीवन दिलचस्प बना रहता है दूसरे इनको शान्ति का आभास  होता है.

 

इनकी शान्ति इनके भाईचारा मे निहित होता है, अर्थात गैरमुस्लिम भाईयो का चारा छीन लो, नहीं मिल रहा तो क़त्ल कर दो,  इस्लामिक क्षेत्र मे ही इनकी शांति निहित होती है, अतः ये हमेशा इसके लिए सतत प्रयास रत रहते हैं.  जहाँ इनकी संख्या कम रहती है वहाँ ये खून का घूट पी कर सब कुछ सहते है, गैर मुसलमानों की शांति भी इनके संस्कारित शांति मे खलल तो डालती है जिससे इनका जीवन नीरस हो जाता है, अतः हमेशा ताक मे रहते हैं, प्रोग्राम सेट करते हैं, और मौका मिलते ही धमाका वमाका कर बता देते हैं, गैर मुसलमानों की शांति कितनी खतरनाक  होती है.

 

इनकी कौम हमेशा अपने तरह के शांति टाइप भाई खोजते हैं, उनका समर्थन करते हैं, उनके ऊपर कोई आंच नहीं आने देते, यदि कोई पडोसी देश का मुसलमान भारत मे आ के कष्ट सह रहा है तो जाहिरान तौर पे गलत है, भले ही मूल निवासी  लेकिन गैर  मुसलमान  इन विस्थापितों से तंग आ चुका हो.

 

शांति लाने के लिए ये जरुरी है की संख्या जादा हो, अतः नसबंदी हराम होता है, खैर ये भी संस्कार है जो बचपन से सिखाया  जाता है, और जैसे ही संख्या ठीक ठाक पहुच जाती है, ये अपना सांस्कृतिक  कार्यक्रम शुरू कर देते है.  सबसे मजे की बात ये की मुसलमान इसे खारिज कलर देते हैं, उन्हें ये कहते हुए भी पाया  जाता है की हम हुंडी टाइप के शांति के समर्थक है, लेकिन सिर्फ कहते हैं, विरोध मे सम्मलेन वगैरह नहीं होता  है, कारण ??? मुह मे आम बगल मे केवांच(एक जहरीला पौधा), लेकिन हाँ यदि इस्लामी शांति पर आंच आये तो तत्काल शांति सम्मलेन की घोषणा होती है, जिसमे ये आगजनी उपद्रव, हिंसा कर तुरंत शांति बहाल करने का  कार्य करते है.

 

अभी हाल मे ही  रमजान के पवित्र महीने मे इन्होने पुणे मे शान्ति  बहाल कायम करने की कोशिश की थी,  जो सफल न हो पाया अतः जरुरी था की अपने बंगला देशी(इस्लामी देशी-बाकि तो सब बिदेशी ) भायियो के विरोध मे सड़क पर उतरे, ये हुआ भी, जम के तोड़फोड़ हिंसा के बाद इनका कुछ मनोरंजन तो अवश्य हुआ जिससे शांति बहाल होने मे मदद मिलेगी.  मुंबई भाई चारा सम्मलेन का ये  वीडियो भी जरुर देखें :-

 

भगवान इन्हें शांति दे , आमीन

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