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राहुल हुए साइडलाइन – अब चुनावों मैं चलेगी क्षेत्रीय नेताओं की

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि लोकसभा चुनाव में हार की एक बड़ी वजह पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की संगठन में बड़े बदलाव कर साफ छवि वाले युवाओं को बड़ी भूमिका देने की कोशिश थी। चुनाव के बाद कांग्रेस के शासन वाले कई राज्यों में विरोध के स्वर बुलंद होने से ऐसा लग रहा है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अब राहुल को कदम वापस खींचने का संकेत देने के साथ ही वरिष्ठ नेताओं को संगठन पर अपने असर का इस्तेमाल जारी रखने की इजाजत दे दी है।

इससे जल्द विधानसभा चुनाव का सामना करने जा रहे हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में पार्टी की स्थिति में सुधार की उम्मीद की जा रही है। हरियाणा में कांग्रेस का शासन है। महाराष्ट्र में एनसीपी के साथ वह गठबंधन सरकार चला रही है। झारखंड में भी पार्टी गठबंधन सरकार में शामिल है। कांग्रेस में प्रियंका गांधी को औपचारिक तौर पर शामिल करने की बढ़ती मांग को गांधी परिवार ने वरिष्ठ नेताओं की ओर से राहुल को किनारे करने और उनके असर को कमजोर बनाने की एक कोशिश के तौर पर देखा है। प्रियंका ने पार्टी में कोई बड़ी भूमिका निभाने से इनकार किया है, लेकिन इससे सोनिया को पार्टी में राहुल की ओर से किए जा रहे नए प्रयोगों को रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को पार्टी ने चुनावी मैदान में कमान संभालने की छूट दी है, लेकिन उन्हें इसमें काफी मुश्किलें आ रही हैं। महाराष्ट्र में पार्टी अध्यक्ष मानिकराव ठाकरे कोई कद्दावर नेता नहीं हैं और न ही उनके पास कोई बड़ी योजनाएं हैं। लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद चव्हाण के ज्यादातर सहयोगियों उनकी जगह लेने की असफल कोशिश की है।
लोकसभा चुनाव में कांग्रेस दो और एनसीपी चार सीटें ही जीत सकी और इसे देखते हुए इस गठबंधन के 288 सीटों वाली विधानसभा में कोई बड़ी सफलता हासिल करने की उम्मीद नहीं दिख रही। कुछ विधायक अपनी सीटें बचाने में जुटे हैं और महाराष्ट्र में तीन बार के विजेताओं ने अपनी किस्मत चमकाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया है।

हरियाणा में मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के रेडियो पर विज्ञापनों के अलावा कोई उत्साह नजर नहीं आ रहा। राज्य की 90 विधानसभा सीटों के लिए केवल 1,000 उम्मीदवारों ने ही आवेदन किया है। यह संख्या 2009 में 8,000 आवेदनों की एक-चौथाई से भी काफी कम है। चुनाव के लिए कांग्रेस के प्रचार की अगुवाई कर रहे हुड्डा को काफी विरोध झेलना पड़ रहा है, विशेषतौर पर हाल के स्कैंडल उनके लिए जी का जंजाल बने हुए हैं। यह स्थिति कुछ ऐसी ही है जो पिछले वर्ष दिल्ली में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के सामने विधानसभा चुनाव से पहले आई थी। झारखंड में कांग्रेस झारखंड मुक्ति मोर्चा की पार्टनर है और इस आदिवासी बहुल राज्य में पार्टी के पास कोई भी बड़ा आदिवासी नेता नहीं है। राज्य के अध्यक्ष सुखदेव भगत और राज्यसभा सदस्य प्रदीप कुमार बालमुचु का कद शिबू सोरेन, बाबूलाल मरांडी या बीजेपी के अर्जुन मुंडा जितना बड़ा नहीं है।

NCR Khabar Internet Desk

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